प्यार के शजर की सब फुंगियाँ जला डाली
शाख-ए-गुम तो क्या सारी पत्तियाँ जला डाली
किस तरह मिटायेंग़े दिल से मेरी यादो को
आपने मेरी सारी चिट्ठियाँ जला डाली
मुझको तिनके के जानिब-ए-चमन देखा
उसने सारे पेडो की टहनियाँ जला डाली
पहले तो दिखाये थे सब्ज़ बाग उसने ही
जिसने मेरे ख्वाबो की खेतिया जला डाली
इस तरह अंधेरा है उस तरफ उजाला है
कैसी शमाये लोगो ने दरमियान जला डाली
आये वो इधर शायद हमे मिलने शाम से पहले
शहर-ए-दिल की गलियो की बत्तियाँ जला डाली
दफ्तर-ए-मोहब्बत मे किसने किसके कहने पर
मेरी चाहतो की सब अर्ज़िया जला डाली
चिट्ठिया उनकी तैश मे जला डाली
फिर उन्हे बचाने मे उंगलियाँ जला डाली
January 22, 2008 at 12:24 pm
Wah kya Khub likha hai wah wah
January 23, 2008 at 8:46 am
bahut khub:)pehle chithhiya jala dali,unko bachane ungliya jala dale.